सोई धूप

Picture credit – Anjali my daughter

वो आई धूप
बंद खिड़कियों के शीशों से
कमरे कि देहलीज़ लांघ कर
वो लाई धूप
उस दूर जलती आग कि आंच
हथेली में बचा कर
किरनों की गुस्ताख हाथों ने
चुपके से मला
वो आलसी गर्माहट मेरे गालों पर
दूर से आई आंच
मेरे पल का हिस्सा बन गई
कुछ कहा नहीं
पर कुछ एहसास सा दे गई
कुछ कहते कहते
यूँ आंख सी लग गई
कुछ देर मेरे साथ
वो धूप भी सो गई

नयी सुबह

कुछ खो सा गया है
ऐसा एहसास है।
क्या कोई चमन था
जो खो गया है?

खून की बारिश
कुछ थम सी गई है,
खुला आसमान
कुछ नया सा लगता है।

खौफ का आलम
कुछ ऐसा था कि,
इस खामोश अमन
की आदत नहीं थी।

हालात बदलेंगे
शक इस बात का हर वक़्त रहा,
अपनी खुश नसीबी का
अर्से से एतबार नहीं है।

इतना झूट से रिश्ता
गहरा हो गया है,
सच्चाई पे अब
विश्वास ही नहीं है।

शायद,
मौसम बदल रहा है,
नया आलम आने को है,
कुछ खोने का एहसास है तो सही,
पर शायद पाने का डर भी भरा है।

आओ आंखें मलें,
और अपने नसीब को सवार लें।
खौफ और शक की रात गई
नयी सुबह होने को है।