दीवार पे तस्वीर

दीवारों पे टंगी तस्वीर ने
बेजुबान कई कहानियां
अतीत की आवाज़ चुरा कर
आज मुझे सुनाया है

कैद कर वो लम्हा
तस्वीरों के बेजान पन्नों पर
फिर आज जैसे
वही एहसास लौट आया है

नज़र धुंधला गई है
आंखे नम हो गई है
तस्वीर वहीं दीवार पे थम गई है
पर अरमानों ने उड़ान भर ली है

समय की सूइयों को
मोड़ने का ख्याल आया है
उस लम्हे को फिर से
जीने का ख्वाब सजाया है

समय की रेत को टटोला
तो वो लम्हा हाथ आया है
उसी लम्हें में पूरी उम्र
गुजारने का ख्याल आया है

वहां हमेशा तक

यूहीं साथ चले
कुछ देर तक
कुछ दूर तक

यूहीं साथ चले
कदमों के निशान
समय की रेत पर

ऐसा लगा
कल की बात है
साल २२ बीत गए

बातों बातों में
वक़्त का पता ना चला
कई कहानियां कह गए

कुछ मीठे
कुछ तीखे
कई पकवान सज गए

जिस्म अलहदा सही
अपने काम में मशरूफ कभी
एहसास गहरे रह गए

कदम साथ यूं चले
एक हस्ती रह गई
बाकी निशान मिट गए

यूंही चल पड़े
साथ साथ
कुछ दूर तक
वहां हमेशा तकl

एक और एज़फा सिफर हो गया

डायरी में काम लिख कर
पूरा दिन भर दिया
लो एक दिन और गुजर गया
एक और इज़ाफ़ा
सिफर हो गया

ये लिस्ट लंबी है
अभी काम बाकी है
वक्त का हर लम्हा भर सा गया है
एक और दिन इसी होड में
बिसर हो गया

रस्ता लंबा है
पेड़ों का साया पीछे रह गया
रुकने का वक्त मुकर्रर नहीं किया
हर नज़ारा मायूस है
कि नज़र अंदाज़ हो गया

सुबह हुई
रात का इंतजार हुआ
दिन गिनते हुए साल तमाम हुआ
उम्र बीत गईं
सुकून ए महफ़िल का इंतज़ार रहा

कौनसी मंज़िल मेरी है
कहां मुझे जाना है
कल इस पर गौर किया जाएगा
आज का दिन सारा
फिक्र में गुज़र गया

लंबी ड्राइव

चलो एक लंबी ड्राइव पे चलें
रास्ते और मंजिल से बेफ़िकर
एक बार बिना किसी मतलब के चलें

कुछ दूर चल कर तुम
सुकून की तरफ मोड़ लेना
मन करे तो वो अपना
पुराना गाना भी लगा लेना

आज हर बात की छूट है
हाँ तुम गुनगुना भी सकते हो
अपनी ही तो गाड़ी है
सुरों को तोड़ मरोड़ भी सकते हो

उन जंजीरों को फेंक देना
ख्वाहिशों को जो जकड़े हुए हैं
उन कचरे के डिब्बों में
जो रस्ते के मोड पर पडे़ हुए हैं

कभी सड़क पर
कभी थोड़ा उड़ते हुए
बादलों को अपनी सासों में रखना
अपनी रफ्तार तेज
और समय की रफ्तार धीमी रखना

वो देखो वहां रोशनी है
हंसी के कहकहे भी सुनी है मैंने
चलो उस तरफ चलें
रास्ते और मंजिल से बेख़बर
अपने बचपन में चलें
चलो एक लंबी ड्राइव पे चलें
चलो खयालों कि लंबी ड्राइव पे चलें
चलो अपने बचपन में चलें

सोई धूप

Picture credit – Anjali my daughter

वो आई धूप
बंद खिड़कियों के शीशों से
कमरे कि देहलीज़ लांघ कर
वो लाई धूप
उस दूर जलती आग कि आंच
हथेली में बचा कर
किरनों की गुस्ताख हाथों ने
चुपके से मला
वो आलसी गर्माहट मेरे गालों पर
दूर से आई आंच
मेरे पल का हिस्सा बन गई
कुछ कहा नहीं
पर कुछ एहसास सा दे गई
कुछ कहते कहते
यूँ आंख सी लग गई
कुछ देर मेरे साथ
वो धूप भी सो गई