Aaj bhi vaisa hi

इन उँगलियों पे लिपटी

वो हसरत भरे नरम हाथ

मासूम नज़रों से ताकती

वो नज़र और वो एहसास

आज भी वैसे ही है

दौड़ के सीने से लगना

खुश हो कर कंधो पर झूल जाना

हर आप बीती बयान करना

वो चुलबुली सी बातें

आज भी वैसे ही हैं

उस शरारती कोने में छिपा हुआ

वो क़िस्सा आज भी महफ़ूज़ है

वो ग़ुस्ताख़ पर्चे और ख़ाली ख़त के पन्ने

वो किताबों में छुपे सूखे फूल

आज भी वैसे ही हैं

स्कूल की वैन में बैठे

भरी आँखों से पलट कर देखना

मेरा लपक कर उसे बाहों में भर लेना

वो झिझक और वो भीगे नैन

आज भी वैसे ही हैं

पर आज रोक ना पाया,

अपना रास्ता खुद चुन रही है

बड़ी जो हो गयी है वो

पर मेरी नज़र में आज भी

वो नज़र और वो एहसास

आज भी वैसे ही है

My own ink

Life passes in a blink

Living it always on the brink

Take a pause and think

script life with your own ink

This poem in 22 words is in response and inspired by the prompt word ‘ink’ https://sammiscribbles.wordpress.com/2021/06/26/weekend-writing-prompt-215-ink/

Do read other wonderful expressions of ‘Ink’ wrapped in 22 words. Do share your comments.

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Unbridled Laughter बेफ़िक्र बिंदास हँसी

होंठों से आँखो तक पहुँचती
फिर आयी वो हँसी
बेफ़िक्र बिन्दास
वही ठहाकों वाली हँसी

दोस्तों की बातों में
पुराने लम्हे फ़िर ताज़ा हुए
कुछ क़िस्से जो याद थे
कुछ चुपचाप भुलाए हुए

हंसते हंसते शायद
ग़ुस्ताख़ आँखें भर आयी
कुछ देर जैसे अनबुलायी
चुप्पी सी छागयी

अपने ख़यालों में चुपचाप
सबने अपनी ज़िंदगी फिर जी ली
खामोशी ने सबकी कहानी
चीक चीक के सुना दी

स्क्रीन से आँख हठी तो
बंद खिड़कियों का अहसास फिर लौट आया है
मेरे ख़ाली कमरे की ख़ामोशी में
हँसी की ठहाकों ने हुड़दंग मचाया है

शर्मिंदा खामोशी से
उस लतीफ़ा ने बचाया है
दूर बैठे दोस्तों को
अपने कम्प्यूटर की स्क्रीन पे पाया है

आज खुल के बेफ़िक्र
फिर से हंस लिया है
उन ख़ुशी के लमहों को
एक बार फ़िर जी भर के जी लिया है