Shayad

कुछ लिख देता हूं
यूं ही
अपने सच्चे झूठे अल्फ़ाज़
बस यूं ही

तुम्हें पसंद आया
तो लगा
शायद
अच्छा होगा

तुमने माना
तो लगा
शायद
सच्चा होगा

किसको फर्क
किसको परवाह
क्या सच
और किसका सच

पर ये तो सच है
की एक एहसास
जो मेरा था
अब हमारा है

इसी सच पर
यकीन है
इसी भरोसे पर
ये नई मोहिम है

कुछ और लिख रहा हूं
ये सोच कर
तुम्हे पसंद आएगा
बस यूं ही शायद

Phir ek baar

फिर वही दिन
जीना चाहता हूं
फिर वही राहों से
गुजरना चाहता हूं

हर उस पल को
महसूस करना चाहता हूं
जैसा था, जैसा हुआ
बस वैसा ही रखना चाहता हूं

हर खुशी
और गम के लम्हों को
फिर एक बार
चखना चाहता हूं

कुछ छोटे
कुछ लंबे
कदमों के निशान पर
फिर चलना चाहता हूं

कुछ बदलने की ख्वाइश नहीं
कोई शिकवा कोई शिकायत नहीं
बस एक बार और
जीना चाहता हूं

Warm winter sun

Warm winter sun
mild and shy
meekly easing out
haze obscuring the morning sky

lights up the grassy meadows
enlivens the trees
warms the dew drop
on the grass and the leaves

golden drop is shared
equal and fair
rich and poor
each get their share

patiently attending to all
alive and dead
all those who are awake
and those in bed

All obligations met
it comes to my porch
resting a while
before it resumes to scorch

He likes my company
I talk no shop
and when he wants to go
I never stop

We just sip coffee
with no Joy or Sorrow
No plans for the day
No expectations of tomorrow

At these moments
time ceases to run
moments spent lazily on the porch
with warm winter sun

मुखौटे

ऐसा कुछ है
जो भूल गया
शायद कोई बात है
जो कहते कहते रह गया।

थोड़ी हिचक
थोड़ी शर्म
रोक टोक
और अनदेखा भ्रम।

ज़िन्दगी की सीख से चुनी
रसमों की दीवारों में
सही और गलत रंग की
सियाही से लिखे
दकियानूसी रिवाजों ने

एक एक कर
दफनाया है
कई सहमें से ख्वाबों को।

ऐसे ही दिन गुज़र गए
दुनिया से बेज़ार
रह गए तो बस
मुखौटे हज़ार।

नए चेहरे लगा कर
आज फिर मुस्कुराया हूं
अब इसी चहरे से वाकिफ हूं
अपनी असल भूल आया हूं