मुखौटे

ऐसा कुछ है
जो भूल गया
शायद कोई बात है
जो कहते कहते रह गया।

थोड़ी हिचक
थोड़ी शर्म
रोक टोक
और अनदेखा भ्रम।

ज़िन्दगी की सीख से चुनी
रसमों की दीवारों में
सही और गलत रंग की
सियाही से लिखे
दकियानूसी रिवाजों ने

एक एक कर
दफनाया है
कई सहमें से ख्वाबों को।

ऐसे ही दिन गुज़र गए
दुनिया से बेज़ार
रह गए तो बस
मुखौटे हज़ार।

नए चेहरे लगा कर
आज फिर मुस्कुराया हूं
अब इसी चहरे से वाकिफ हूं
अपनी असल भूल आया हूं