एक और एज़फा सिफर हो गया

डायरी में काम लिख कर
पूरा दिन भर दिया
लो एक दिन और गुजर गया
एक और इज़ाफ़ा
सिफर हो गया

ये लिस्ट लंबी है
अभी काम बाकी है
वक्त का हर लम्हा भर सा गया है
एक और दिन इसी होड में
बिसर हो गया

रस्ता लंबा है
पेड़ों का साया पीछे रह गया
रुकने का वक्त मुकर्रर नहीं किया
हर नज़ारा मायूस है
कि नज़र अंदाज़ हो गया

सुबह हुई
रात का इंतजार हुआ
दिन गिनते हुए साल तमाम हुआ
उम्र बीत गईं
सुकून ए महफ़िल का इंतज़ार रहा

कौनसी मंज़िल मेरी है
कहां मुझे जाना है
कल इस पर गौर किया जाएगा
आज का दिन सारा
फिक्र में गुज़र गया

हज़ारों ख्वाहिशें

इतवार तो कैलेंडर पे लिखा शब्द है
उसका इतना इंतज़ार क्यूँ
हफ्ता पड़ा है जीने को
आज से इतनी मायूसी क्यूँ

शायद फुर्सत का इंतज़ार है
पर किस बात से फुर्सत?
इसकी मालुमात नहीं
क्या पता किस आराम कि ख्वाहिश है
और किस आराम से आज कल
अछे तालुकात नहीं

कभी सोने कि कोशिश में
रात गई
और कभी नींद उड़ाते
सुबह हुई

कुछ ख्वाहिशें ऐसी, जो मुमकिन है
कुछ ख्वाहिशें ही गुनाह है
जो मुमकिन है, वो तो आसान है
जो गुनाह है उसीका नशा है

अपने जुनून को पहचान लो
नशा जिसका है उसे एक नाम दो
फुर्सत नहीं, मौका दूंड़ेंगे
जिसमे मज़ा है उस ख्वाहिश का आराम लो

आज दिन अच्छा है
मुहूर्त आज का निकला है
इतवार का क्या है
आज कैलेंडर नया निकला है